संस्था सेवा का माध्यम है, न कि सुख भोग का साधन

कुछ लोग अपनी संस्था को समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और जनकल्याण के उद्देश्य से मजबूत करते हैं, वहीं कुछ लोग संस्था को केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधा और लाभ प्राप्त करने का साधन बना लेते हैं। इन दोनों के बीच का अंतर ही किसी संगठन की असली पहचान तय करता है। जो व्यक्ति संस्था को मजबूत करने के लिए कार्य करता है, वह निस्वार्थ भाव, त्याग, अनुशासन और समर्पण को प्राथमिकता देता है। उसका उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुँचाना होता है। ऐसे लोग अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर संगठन की प्रतिष्ठा, विस्तार और प्रभाव को बढ़ाने में जुटे रहते हैं।

वहीं दूसरी ओर, जो लोग संस्था को केवल सुख भोगने का माध्यम मानते हैं, उनका ध्यान सेवा से अधिक अपने लाभ, पद और सुविधा पर होता है। ऐसे लोग संगठन की मूल भावना को कमजोर करते हैं और धीरे-धीरे संस्था अपने उद्देश्य से भटकने लगती है। आज के समय में यह आवश्यक है कि हम सभी यह आत्ममंथन करें कि हम किस दिशा में कार्य कर रहे हैं। संस्था तभी मजबूत होगी जब उसके कार्यकर्ता त्याग, सेवा और समर्पण की भावना से जुड़ेंगे।

राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर (भाजपा) इसी सेवा और समर्पण का एक सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है। संगठन द्वारा पूरे भारत में

54 गौशालाओं का संचालन, 50 सनातन आश्रमों की स्थापना, 50 गुरुकुलों के माध्यम से संस्कारयुक्त शिक्षा, 35,000 से अधिक बच्चों का पालन-पोषण एवं शिक्षण, तथा प्रत्येक वर्ष 1000 से अधिक कन्याओं के विवाह जैसे पुण्य कार्य निरंतर किए जा रहे हैं।

यह कार्य केवल संगठन नहीं, बल्कि एक सेवा-यज्ञ है, जिसमें हर कार्यकर्ता अपनी आहुति दे रहा है। अतः स्पष्ट है कि संस्था को मजबूत करने वाले लोग इतिहास बनाते हैं, जबकि संस्था का उपयोग केवल सुख भोग के लिए करने वाले लोग धीरे-धीरे स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं। हम सभी का कर्तव्य है कि सेवा, त्याग और समर्पण के मार्ग पर चलते हुए संगठन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएं।