मामला उपमुख्यमंत्री तक पहुँचा, निष्पक्ष जांच का इंतजार
लखनऊ। अमेठी जनपद के जगदीशपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) एक बार फिर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी गंभीर शिकायतों, पुराने संवेदनशील प्रकरणों तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर उठे सवालों के कारण चर्चा में है, जहाँ उपस्थिति एवं वेतन व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के आरोपों के साथ-साथ एक दिव्यांग महिला से जुड़ा मामला और लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनाती का मुद्दा सामने आने से पूरे प्रकरण ने व्यापक रूप ले लिया है।
भारतीय जनता पार्टी ओबीसी मोर्चा से जुड़े सुरेश यज्ञ सैनी द्वारा प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश शासन को सौंपे गए विस्तृत प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात कुछ चिकित्सक एवं कर्मचारी लंबे समय से नियमित रूप से ड्यूटी पर उपस्थित नहीं रहते, जबकि उपस्थिति पंजिका में उपस्थिति अंकित कर वेतन आहरण किया जाता रहा है, जिससे पारदर्शिता एवं जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
शिकायत में जिन चिकित्सकों एवं कर्मचारियों के नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं, उनमें डॉ. बृजेंद्र (आर्थोसर्जन), डॉ. रजनी (सर्जन), डॉ. अजीत कुमार सिंह (एनसीडी), डॉ. प्राची शुक्ला (एनेस्थेटिस्ट), दयाराम (ओटी टेक्नीशियन), अर्चना दीपांकर (एएनएम), एन.ए. खान (डेंटल हाइजिनिस्ट) तथा राजेश (एलटी) सहित अन्य स्टाफ का उल्लेख किया गया है।
आरोपों के अनुसार उपस्थिति पंजिका में नाम जोड़ने, बाद में संशोधन किए जाने, फर्जी हस्ताक्षर तैयार किए जाने तथा बिना कार्य किए वेतन भुगतान किए जाने जैसी अनियमितताओं की आशंका जताई गई है, साथ ही वर्ष 2026 के रिकॉर्ड में अवकाश एवं गैर-कार्य दिवसों पर भी उपस्थिति दर्शाए जाने की बात सामने लाई गई है।
डॉ. बृजेंद्र के संबंध में आरोप है कि नियुक्ति के बावजूद लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के बाद भी उपस्थिति एवं वेतन दर्ज किया गया, वहीं डॉ. प्राची शुक्ला के संबंध में आरोप है कि एनएचएम के अंतर्गत सीमित उपस्थिति के बावजूद नियमित वेतन आहरण जारी रहा तथा उन्हें विभिन्न पंजिकाओं में स्थानांतरित दिखाया गया, इसी प्रकार डॉ. अजीत कुमार सिंह एवं ओटी टेक्नीशियन दयाराम के संबंध में भी सीमित उपस्थिति के बावजूद नियमित उपस्थिति दर्शाकर वेतन भुगतान किए जाने के आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि ब्लड स्टोरेज यूनिट लंबे समय से बंद है, आरओ सिस्टम खराब पड़े हैं तथा एक्स-रे सुविधा उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को बाहर जांच हेतु भेजा जा रहा है, जिससे आमजन को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
इसके साथ ही अधीक्षक पद की नियुक्ति को लेकर नियमों के अनुपालन पर प्रश्न उठाए गए हैं, जिसमें लेवल-2 अधिकारी को अधीक्षक बनाए जाने के बावजूद संस्थान में लेवल-3 एवं लेवल-4 के वरिष्ठ चिकित्साधिकारी कार्यरत होने का उल्लेख करते हुए इसे शासनादेश एवं न्यायालयीय निर्देशों के संदर्भ में परीक्षणीय बताया गया है।
प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए शिकायतकर्ता सुरेश यज्ञ सैनी ने उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक से भेंट कर विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की है, जिसके बाद प्राप्त जानकारी के अनुसार उपमुख्यमंत्री द्वारा निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया गया है।
इसी बीच एक अन्य संवेदनशील मामला भी पुनः चर्चा में है, जिसमें एक दिव्यांग महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अल्ट्रासाउंड जांच के दौरान महिला को उचित सुविधा उपलब्ध न होने पर जमीन पर घसीटते हुए ले जाया गया तथा व्हीलचेयर तक उपलब्ध नहीं कराई गई, इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन द्वारा पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की गई थी, लेकिन समय बीतने के बावजूद न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है और न ही किसी जिम्मेदार के विरुद्ध कार्रवाई की पुष्टि हो सकी है, जिससे यह मामला अभी भी लंबित स्थिति में माना जा रहा है।
इसी क्रम में एक अन्य प्रशासनिक पहलू भी चर्चा में है, जिसमें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक चिकित्साधिकारी के लगभग 12 वर्षों से एक ही स्थान पर तैनात रहने का मुद्दा सामने आया है, जानकारी के अनुसार डॉ. संजय कुमार वर्ष 2012 से लगातार यहीं कार्यरत हैं और वर्तमान में अधीक्षक पद पर हैं, जबकि सामान्य स्थानांतरण नीति के अनुसार निर्धारित अवधि के बाद तबादला अपेक्षित माना जाता है, ऐसे में लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनाती को लेकर स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता एवं प्रशासनिक संतुलन के संदर्भ में प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि स्थानांतरण नीति का समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाए तो इससे न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता मजबूत होगी बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जनविश्वास भी बढ़ेगा। वर्तमान में सभी प्रकरण—कथित अनियमितताएं, दिव्यांग महिला से जुड़ा मामला तथा दीर्घकालीन तैनाती का मुद्दा—क्षेत्र में व्यापक चर्चा का विषय बने हुए हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब निगाहें उच्च स्तरीय जांच पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आरोपों में कितनी वास्तविकता है और क्या प्रशासनिक एवं वित्तीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी या नहीं।
सीएमओ का पक्ष प्राप्त होना शेष है।