परशुराम के पराक्रम में विश्वकर्मा की शिल्पकला का योगदान

वाराणसी। भगवान परशुराम और भगवान विश्वकर्मा का संबंध पिता-पुत्र का नहीं, बल्कि शिल्प, अस्त्र-विज्ञान, गुरु-परंपरा और भृगुवंश से जुड़े गहरे संबंध के रूप में वर्णित किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में दोनों के संबंध को लेकर विभिन्न प्रसंग मिलते हैं वाल्मीकि रामायण के बालकांड में परशुराम श्रीराम से दो दिव्य धनुषों का उल्लेख करते हुए कहते हैं— “इमे द्वे धनुषी श्रेष्ठे दिव्ये लोकाभिपूजिते... सुकृते विश्वकर्मणा।” अर्थात ये दोनों श्रेष्ठ और दिव्य धनुष देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हैं। इनमें एक शिव धनुष था, जो जनकपुर में श्रीराम द्वारा भंग किया गया, जबकि दूसरा विष्णु धनुष था, जिसे परशुराम धारण करते थे पौराणिक परंपराओं में विश्वकर्मा को देवताओं का प्रमुख शिल्पी तथा दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और निर्माण-कला का विशेषज्ञ माना गया है। इसी संदर्भ में परशुराम के पास रहे दिव्य धनुष और अन्य आयुधों को विश्वकर्मा की शिल्प परंपरा से जोड़ा जाता है परशुराम के वंश को लेकर भी भृगुवंश का उल्लेख मिलता है। भृगु से च्यवन, ऋचीक और जमदग्नि होते हुए परशुराम तक वंश परंपरा का वर्णन पुराणों और महाभारत में मिलता है। विश्वकर्मा से जुड़े विभिन्न पौराणिक वंश-प्रसंगों और भृगुवंश के संबंध को लेकर विद्वानों की अलग-अलग व्याख्याएं भी मिलती हैं परशुराम के नाम में प्रयुक्त ‘परशु’ उनके प्रमुख आयुध का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें भगवान शिव से परशु प्राप्त होने का वर्णन मिलता है। इस प्रकार परशुराम की पहचान एक ऐसे योद्धा-ऋषि के रूप में होती है, जिनके जीवन में दिव्य अस्त्र, शस्त्रविद्या और धर्मरक्षा का विशेष महत्व रहा भगवान विश्वकर्मा को जहां सृष्टि के दिव्य शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण-कला के अधिष्ठाता के रूप में पूजा जाता है, वहीं भगवान परशुराम को धर्म और न्याय की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने वाले ऋषि-योद्धा के रूप में स्मरण किया जाता है। दोनों से जुड़े पौराणिक प्रसंग भारतीय परंपरा में शिल्प और शौर्य के समन्वय को दर्शाते हैं।