उसे क्या पता था कि वह किसी के "एकतरफा वासना" की रुकावट है। उसे क्या पता था कि उसकी माँ का "नहीं" कहना उसकी मौत का कारण बन जाएगा। 24 वर्षीय दरिंदे जितेंद्र पाठक उर्फ विराज ने टॉफी का लालच देकर उस मासूम को ले जाकर 8 बार ज़मीन पर पटका ऐसा पटका कि शुरुआती विडियो मुझे काटना पड़ा
हे भगवान आठ बार यै CCTV में दर्ज हमारी सामूहिक विफलता का जीता जागता दस्तावेज़ है।
कुछ लोग पूछेंगे "यह तो एक पागल की करतूत है, इसमें समाज कहाँ से आ गया?" मेरा उत्तर है यह पागलपन शून्य में नहीं पनपा।
वह युवक उसी समाज की उपज है
जहाँ चौबीस साल की उम्र होने तक उसें यही समझ आया कि पुरुष का "चाहना" स्त्री की "स्वीकृति" से बड़ा है। हमारी फिल्मों में नायक बार-बार मना करने पर भी पाता ही है।
जहाँ "नहीं" को अपमान माना जाता है और अपमान का बदला लेना "मर्दानगी।" और बदला लेने में तेजाब से नहला देना, सामुहिक बलात्कार यहां तक कि मार डालना भी हमारे लाड़लों को जायज़ लगने लगता है अपवाद स्वरूप पूर्वोतर राज्यों के माताओं बहनों के निर्णयों को सर्वोपरि मानने के पारिवारिक संस्कारों के अलावा बाकी पूरे देश के किस क्षेत्र में अपने बेटों के साथ बैठकर यह बात की जाती है कि़
अस्वीकृति भी जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है? हमने कब उन्हें सिखाया कि प्रेम अहसास की चीज़ है, छीनने की नहीं? आत्मचिंतन करेंगे तो पाएँगे कि
हमारी दुकानों, घरों, गुवाड़ों में जो चर्चाएँ होती हैं वहाँ लड़की के "चरित्र" पर तो बात होती है लड़के की "मानसिकता" पर कभी नहीं।
इतिहास गवाह है जब भी समाज ने स्त्री को "वस्तु" माना तब तब हिंसा के नए अध्याय लिखे गए।
यह केवल भारत की समस्या नहीं। रोमन साम्राज्य से लेकर आधुनिक राज्य तक — जब भी किसी वर्ग को "कमतर" माना गया तब तब उस वर्ग पर अत्याचार को "स्वाभाविक" समझा गया। हमने स्त्री को वही दर्जा दिया —
और फिर आश्चर्य करते हैं कि विराज जैसे लोग कहाँ से आते हैं। कानून अपना काम करेगा। POCSO और हत्या की कठोरतम धाराएँ लगी हैं। पुलिस ने जनभावनाएं न भड़कें इसलिए एनकाउंटर में दोनों पैरों में गोली मारकर पकड़ा है।
लेकिन क्या केवल गोली से यह सोच मरती है? नहीं। जब तक हम अपने घर की दहलीज़ पर यह बातचीत नहीं करते तब तक हर कुछ वर्षों में एक नया विराज पैदा होता रहेगा और एक नया आरव मारा जाता रहेगा।
रति देवी का दर्द कल्पना से परे है। उस माँ के लिए कोई शब्द पर्याप्त नहीं। और आरव को तो मानव जीवन की दुर्लभता समझ आने से पहले ही मात्र डेढ़ वर्ष में इस क्रूर दुनिया ने छीन लिया।स्मरण रहे सच्चा समाज वह नहीं जो हत्यारे को सज़ा दे। सच्चा समाज वह है जो हत्यारे को पैदा होने से रोके। और वह काम कोई सरकार नहीं करेगी।
वह काम हमें अपने घर से, अपने बेटों से, आज से शुरू करना होगा। हृदय द्रवित है आरव के लिए जो मानवता के उत्थान के लिए कितनी बड़ी संभावना बन सकता था और माँ रति देवी को इस वज्रपात को सहने की शक्ति परमात्मा प्रदान करें